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   स्वास्थ्य
   स्तन कैंसर की शिकार कामकाजी महिलाएं अधिक
 

वर्तमान समय में स्तन कैंसर की चपेट में अधिकतर महिलाएं आ रही हैं। स्तन कैंसर के प्रकोप से ऐसी महिलाएं भी प्रकोपित दिखाई देने लगी हैं, जिनकी वैवाहिक जीवन की शुरूआत तक नहीं हुई है। अगर यह कहा जाय कि स्तन कैंसर रूपी सुरसा का मुंह आज के समय निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है तो कतई असत्य नहीं होगा।

   
 

वर्ल्ड हैल्थ आर्गनाइजेशन की हालिया रिपोर्ट के अनुसार विश्व में सालाना लगभग 1.2 मिलियन से भी अधिक महिलाएं स्तन कैंसर का उपचार करवाती हैं। इस बीमारी से प्रतिवर्ष लगभग पांच लाख महिलाएं सम्पूर्ण विश्व में असमय ही कालग्रस्त हो जाया करती हैं। भारत जैसे विकासशील देश में भी स्तन कैंसर का भयानक रूप धीरे-धीरे अपना पांव बढ़ाने लगा है।

स्तन कैंसर का भयानक रोग पांच प्रतिशत वंशानुगत कारणों से हुआ करता है। यह माता या पिता के संक्रमित जीवाणुओं के निस्सरण से होता है। ऐसी महिलाओं में स्तन कैंसर की अगर प्रारम्भिक अवस्था में ही जांच हो जाये तो उपचार से तुरन्त लाभ मिल सकता है।
इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के अनुसार देर से बच्चा होना, कम उम्र में रजःस्राव (मासिक) का शुरू होना, देर से शादी होना, स्तन-पान न कराना या कम अवधि तक कराना, देर से बच्चा होना, आदि के कारणों से भी भारतीय महिलाओं में स्तन-कैंसर का प्रकोप होता है। काउंसिल के स्वास्थ्य वैज्ञानिकों के अनुसार जो महिलाएं कामकाजी होती हैं, अर्थात्‌ द्घर से बाहर निकलकर काम करती हैं, उनमें सामान्य महिला से अधिक स्तन कैंसर होने का खतरा बना रहता है।
आज के समय में कैरियर बनाने के चक्कर में महिलाएं शादी को प्राथामिकता नहीं दे रही हैं। तीस-पैंतीस की उम्र में शादी करना,शादी के बाद भी पांच-सात वर्षों तक बच्चे को जन्म न देना आदि रिवाज बनता जा रहा है। इस रिवाज ने स्तन कैंसर को प्रश्रय दिया है और महिलाएं इसके चक्रव्यूह में फंसकर असमय काल का ग्रास बनती जा रही हैं।
अमेरिकन कैंसर सोसाइटी के अनुसार चालीस वर्ष या उससे अधिक उम्र की स्वस्थ महिला को प्रत्येक वर्ष अपने स्तनों की जांच अवश्य ही करवा लेनी चाहिए। जांच से शुरूआती दौर में ही इस रोग की पहचान हो जाती है तथा इसकी भयावहता से पूर्व ही उसका उपचार शुरू होकर बीमारी दूर हो सकती है।
अधेड़ उम्र या तीस वर्ष की आयु में पहला बच्चा जन्म देने वाली महिला अगर दूसरे बच्चे को जन्म न दे सकी हो तो उसे अपनी शारीरिक जांच अवश्य करवा लेनी चाहिए। इसी प्रकार चालीस वर्ष की आयु या उसके बाद की महिला में सैक्सगत रूचियां कम होने लगे तो, उसे भी अविलम्ब अपनी शारीरिक जांच करवा लेनी चाहिए। हो सकता है उनमें स्तन कैंसर के पूर्व के लक्षण पनप रहे हों।
हाई रिस्क वाली महिलाओं को एम.आर.आई. और मैमोग्राम जांच प्रत्येक वर्ष करानी चाहिए। ऐसी महिलाएं इन जांचों के माध्यम से 15-20 प्रतिशत लाइफटाइम रिस्क से बचाव कर सकती हैं। जिन महिलाओं का लाइफटाइम रिस्क 15 प्रतिशत से कम हो, उन्हें प्रत्येक वर्ष एम.आर.आई. कराने की आवश्यकता नहीं होती है।
तीस वर्ष या उससे कम आयु की महिला के स्तनों में अगर अस्वाभाविक उम्र की स्वस्थ महिला को प्रत्येक वर्ष अपने स्तनों की जांच अवश्य ही करवा लेनी चाहिए। हाई रिस्क वाली महिलाओं को एम.आर.आई. और मैमोग्राम जांच प्रत्येक वर्ष करानी चाहिए। ऐसी महिलाएं इन जांचों के माध्यम से 15-20 प्रतिशत लाइफटाइम रिस्क से बचाव कर सकती हैं। जिन महिलाओं का लाइफटाइम रिस्क 15 प्रतिशत से कम हो, उन्हें प्रत्येक वर्ष एम.आर.आई. कराने की आवश्यकता नहीं होती है।
तीस वर्ष या उससे कम आयु की महिला के स्तनों में अगर अस्वाभाविक जकड़न होनी प्रारम्भ हो जाए तो स्तन कैंसर होने का खतरा बना रहता है। कुछ मामलों में 12 वर्ष की आयु से पहले मासिक धर्म शुरू हो जाय या पचास वर्ष के बाद भी मासिक धर्म होता ही रहे, तब भी दोनों स्थितियों में अविलम्ब ही स्तनों की जांच करवा लेनी चाहिए क्योंकि इन स्थितियों में भी स्तन कैंसर का खतरा बन सकता है।
अमेरिकन कैंसर सोसाइटी के अनुसार स्तनों पर अत्यधिक दबाव देना, उसकी मसाज बिलकुल न करना, चुस्त ब्रा पहनना, काले रंग की ब्रा का अधिक इस्तेमाल करना आदि के कारण भी स्तनों में गांठ बन सकती है। इसका परीक्षण अतिशीद्घ्र करवा लेना उचित होता है।
स्तन कैंसर जांच के अनेक तरीके उपलब्ध हैं। किसी भी सुविधाजनक जांच करवाकर संतुष्ट हुआ जा सकता है। मैमोग्राफी जांच दर्दहीन, कम खर्चीली तथा आसानी से उपलब्ध होने वाली जांच है। इससे स्तन कैंसर का पता तुरंत चल जाता है। इससे स्तन कैंसर की भयावहता से बचा जा सकता है।

 

 
 

 

 

     
     
 
 
 

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