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  GREHSAHELI  

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   स्वास्थ्य
   मौत को खुला निमंत्रण है मांसाहार
  शाकाहारी भोजन की ओर भारत ही नहीं, संपूर्ण विश्व की जनता भी अब लौटने के प्रयत्न में हैं क्योंकि मांसाहारी आहार से अनेक रोगों का जन्म हो रहा है। चिकित्सकों का भी मानना है कि शाकाहार स्वास्थ्य के लिए उत्तम आहार है। एक प्राचीन भारतीय सिद्धान्त के अनुसार सात्विक भोजन से मनुष्य का शरीर सात्विक होता है जिसमें क्रोध, हिंसा, उत्तेजना अपेक्षाकृत कम उपजती है जिससे एक स्वस्थ व्यक्ति और समाज का निर्माण होता है।    
  शायद यह बात भी सत्य है कि प्राचीन भारत में शाकाहार जितना लोकप्रिय रहा, उतनी ही शान्ति समाज में व्याप्त रही। जैसे-जैसे समाज मांस और मदिरा की चपेट में आता गया, हिंसा और पैशाचिक प्रवृत्तियां समाज में बढ़ने लगी। नतीजा आज और भयावह रूप में सामने आ रहा है। क्रूरता और निष्ठुरता कुछ इस प्रकार हमारे समाज में हावी हो चुकी है कि पिता पुत्र और बहन, पति पत्नी तक के रिश्ते अपनी अहमियत खोते नजर आ रहे हैं।

दूसरी ओर मांसाहारी अपने आहार के समर्थन में यही कहते आये हैं कि यह स्वास्थ्यवर्द्धक आहार है। यदि एक क्षण के लिए इसे सत्य मान लिया जाये तो यह कहां तक न्यायसंगत बात है कि अपने स्वास्थ्य के लिए तृणजीवी या विशुद्ध शाकाहारी जीवों की हत्या कर रहे हैं।
कल यदि कोई यह कह दे कि अमुक व्यक्ति का मांस आपको लम्बा जीवन देने में समर्थ है तो क्या उसे आप मार खायेंगे अथवा कोई चिकित्सक द्घोषणा कर दे कि व्यक्ति अपने बच्चे के खून का टॉनिक पिये तो स्वस्थ और दीर्द्घायु होंगे तो क्या आप अपने बच्चे की हत्या बेहिचक कर सकते हैं।
कुछ मांसाहार समर्थक इसके स्वाद की दुहाई देकर शाकाहार और फलों को नीरस साबित करते हैं लेकिन यह दावा करने के पहले क्या वे यह जानने की कोशिश करते हैं कि बिना तले और मसाला डाले यदि कच्चा मांस उन्हें दिया जाये तो क्या वे उसे खा सकते हैं?जबकि आप किसी भी सब्जी या फल को कच्चा खा भी लें तो फायदा ही होगा। अगर गलती से किसी मांसजीवी पशु का मांस मनुष्य खा ले तो या तो वह मर जायेगा अथवा उसे संक्रामक बीमारी हो जायेगी।
इस तरह अपनी मांस लिप्सा के समर्थन में नित्य नवीन बेबुनियाद साक्ष्य ऐसे लोग प्रस्तुत करते रहे तो यकीन जानिये आप नित्य दिन एक कदम मौत की तरफ बढ़ रहे हैं क्योंकि हमारे शरीर की बनावट न तो मांसाहारी आहार के अनुरूप है, न स्वास्थ्य के अनुरूप है।
सात्विक भोजन न केवल स्वास्थ्य के अनुरूप है बल्कि यह सामान्य और स्वास्थ्यवर्द्धक भी है जो न केवल दीर्द्घायु बनाता है बल्कि शुद्ध विचारों को भी उत्पन्न कर समाज में शान्तिदायक वातावरण को जन्म देता है।

 

 
 

 

 

     
     
 
 
 

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