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  GREHSAHELI  

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   स्वास्थ्य
    गुणकारी औषधि है हल्दी
  हल्दी का प्रयोग न सिर्फ मसाले के रूप में ही किया जाता है बल्कि उसके अंदर छिपे अनमोल औषधीय गुणों के कारण उसका प्रयोग अनेक प्रकार के रोगोपचार के निमित्त भी किया जाता है। हल्दी का उपयोग प्राचीनकाल से ही रूप-सौन्दर्य के निखार के साथ-साथ अनेक कष्टप्रद बीमारियों के निदान हेतु भी किया जाता रहा है।
आचार्य चरक ने हल्दी को लेखनीय कुष्ठध्न (कुष्ठ मिटाने वाले), कण्डूध्न (खुजली दूर करने वाली), विषध्न (विष नष्ट करने वाली) गुणों से युक्त माना है। आचार्य सुश्रुत ने हल्दी को श्वास रोग, कास (खांसी), अरोचक, रक्तपित्त, अपस्मार, नेत्रारोग, कुष्ठ और प्रमेह आदि रोगों पर लाभकारी माना है।
हल्दी पर शोध कर रही डॉ. पूनम दिनकर का मत है कि जिन लोगों में कफ अधिक मात्रा में निकलने लगता है, जैसे नाक से श्लेष्म तथा मुंह से कफ गिरना और प्रमेह आदि रोगों में हल्दी बहुत फायदेमंद रहती है। एक चुटकी हल्दी के सेवन से शरीरगत विषों को निकाला जा सकता है। हल्दी के विविध प्रयोगों को निम्नानुसार देखा जा सकता है।
   
  मुलायम त्वचा के लिए
हल्दी के पाउडर (चूर्ण) को यथेष्ट मात्रा में लेकर उसमें मक्खन अच्छी तरह मिला लें। इस तैयार मिश्रण को शरीर की त्वचा पर अच्छी तरह मलें। आधा द्घंटे के बाद स्नान कर लें। कुछ ही दिनों के प्रयोग से त्वचा कांतिमान बनकर चमकने लगती है।

सुजाक रोग के लिए
सुजाक होने पर जब पेशाब गाढ़ा तथा दर्द के साथ आने लगता है और बूंद-बूंद करके पेशाब निकलता रहता है तो हल्दी और आंवला के मिश्रण से तैयार काढ़ा पीने से बहुत लाभ होता है। इसके काढ़े के सेवन से दस्त साफ होता है तथा पेशाब की जलन कम हो जाती है।
नेत्र रोगों के लिए
चोट लगने से आंखों में आई सूजन, दर्द, लाली, नेत्रास्राव आदि की स्थिति में हल्दी का प्रयोग काफी लाभदायक होता है। हल्दी, दारूहल्दी, नागरमोथा, हरड़, बहेड़ा, आंवला, और शक्कर, इन सभी को बराबर मात्रा में मिलाकर कूट-पीसकर महीन चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को बकरी के दूध में बारह द्घण्टे तक खरल करके बत्ती बना लें। इस बत्ती को स्त्री के दूध में द्घिसकर आंखों में लगाने से उपरोक्त सभी नेत्र रोग दूर हो जाते हैं।

दुर्गन्ध दूर करने के लिए हल्दी, दारूहल्दी, रक्स, सिरस की छाल, नागरमोथा, लोध्र, सफेद चंदन, और नागकेसर को पानी के साथ पीसकर तैयार कर लें। इस लेप को लगाने से पसीने के कारण दुर्गन्ध आना, देह में जलन, दांतों एवं मुंह की दुर्गन्ध, योनिगत विकारों की दुर्गन्ध आना, बन्द हो जाती है।
दर्दों को नष्ट करने के लिए

सर्दी से उत्पन्न दर्द, दस्तों की वजह से उत्पन्न होने वाला जोड़ों का दर्द, मस्तिष्क शूल, संभोग से उत्पन्न योनिगत दर्दों में एक चुटकी हल्दी चूर्ण खाकर ऊपर से गरम-गरम दूध पी लेने से दर्द खत्म हो जाता है। कान के बहने पर हल्दी और फिटकरी को मिलाकर कान में डालने से कान बहना ठीक हो जाता है। इसके लिए इस चूर्ण को गुलाब जल में डालकर छान लें। इस छने हुए रस की कुछ बूंदों को कान में टपका दें।
दूध शुद्ध करने के लिए

प्रसूता काल में जब बच्चा मां के दूध पर ही निर्भर रहता है उस समय प्रसूता अगर नियमित रूप से एक चुटकी हल्दी दूध के साथ लेती रहे तो दूध शुद्ध हो जाता है तथा शिशु को पीलिया (जॉण्डिस) की शिकायत नहीं हो पाती है। इससे गर्भाशय को भी उत्तेजना प्रदान होती है और गर्भाशय में स्थित सभी विकार निकल जाते हैं।
स्तन सूजन निवारण हेतु
कभी-कभी दुग्धपान कराते समय या सहवास के समय स्तनों पर दबाव पड़ने से या अत्यधिक तंग चोली पहनने के कारणों से स्तनों में सूजन हो जाया करती है। इस स्थिति में गवारपाठे के रस के साथ हल्दी चूर्ण को मिलाकर गुनगुना गर्म करके स्तन पर लेप करते रहने से स्तन-सूजन दूर हो जाती है। अगर पकाव पैदा हो गया हो तो वह भी इस प्रयोग से फूट कर बह जाता है।

चोट की सूजन दूर  करने के लिए
पत्थर, लाठी, डण्डे आदि की चोटों के कारण उत्पन्न सूजन को दूर करने के लिए हल्दी चूर्ण को पानी के साथ मिलाकर सुसुम करके लगाना चाहिए। अगर चोट पर खून निकल जाने के बाद सूजन आ गई हो तो हल्दी को खाने वाले चूने के साथ मिलाकर लेप लगा देने से पकने की नौबत नहीं आती तथा सूजन दूर हो जाती है।
जुकाम हो जाने पर
नया जुकाम हो जाने पर दूध में हल्दी मिलाकर उबाल लें, फिर सुसुम रहते उसमें थोड़ा सा गुड़ मिलाकर प्रातः तथा रात को सोते समय पी लें। नाक से अधिक स्राव हो रहा हो तो हल्दी को जलाकर उसका धुआं नाक से ग्रहण करें। अगर जुकाम पुराना हो गया हो तथा पीला, गाढ़ा कफ निकल रहा हो तो दूध में हल्दी मिलाकर थोड़ा सा द्घी डालकर उबाल लें। हल्का गरम- गरम पी लेने से जुकाम दूर हो जाता है। इसके दो द्घंटे बाद तक पानी नहीं पीना चाहिए।
श्वांस रोग पर
बीड़ी, सिगरेट की अधिकता के कारण कफ जब छाती में जम जाता है तो हल्दी के चूर्ण को द्घी में पकाकर छाती पर मलने से कफ निकलना शुरू हो जाता है। इसके साथ ही हल्दी का धुआं भी सूंद्घना लाभकारी होता है।
यौन दुर्बलता पर
शीद्घ्रपतन, लिंग शिथिलता, स्वप्नदोष, आदि यौन रोगों में हल्दी का चूर्ण, गूलर फल का रस व मेथाचीप्स के पत्तों के स्वरस को मिलाकर आग पर पका लें तथा इससे नियमित रूप से लिंग की मालिश करते रहने से उपरोक्त दोष दूर हो जाते हैं। गाय के दस तोले मूत्र के साथ तीन माशा हल्दी चूर्ण मिलाकर उपदंश (गर्मी) जन्य विकारों पर लगाने से विकार दूर हो जाते हैं। इस लेप से खुजली भी मिट जाती है। हरिद्रादि धूप के सेवन से भी यौनगत विकारों का शमन होता है।
                                                                                              -डॉ. दीनानाथ झा 'दिनकर'

 
 

 

 

     
     
 
 
 

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