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श्रम एक प्रकार का ध्वंसात्मक कार्य है जिससे शरीर
की कोशिकाओं का क्षय होता रहता है, जिसके कारण शरीर में एक प्रकार का विष
इकट्ठा हो जाता है। वह स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक होता है। विश्राम
करने से यह विषैला पदार्थ नष्ट हो जाता है और अंगों की क्षतिपूर्ति भी हो जाती
है।
जिस प्रकार श्रम के बाद विश्राम जरूरी है, ठीक उसी प्रकार कई दिन के श्रम के
बाद एक दिन विश्राम करना भी आवश्यक है। संभव हो सके तो कुछ दिन और विश्राम कर
लेना चाहिए। इस प्रकार किया गया आराम व्यर्थ नहीं जाता। कारण ''जो समय
विश्राम में खर्च होता है वह भविष्य में शक्ति का भंडार होता है।'' केवल
शारीरिक आराम ही नहीं बल्कि मानसिक रूप से विश्राम भी लेना चाहिए।
गीता का कथन है-कर्मषू कौशलम्। विश्राम करने के लिए कार्य क्षमता को नियोजित
ढंग से करना आवश्यक होता है अर्थात कार्य इस ढंग से किया जाये जिसमें जल्दबाजी
व चिन्ता न हो। इससे परिश्रम की बचत होती है। शरीर जब विश्राम करता है तब भी
मन विचारता ही रहता है चाहे वह किसी भी रूप में हो। हिंसा, द्वेष, प्रेम,
लूटपाट, अदम्य योजनाओं में मन गोते लगाता रहता है। इस प्रकार विश्राम पूर्ण
नहीं होता।
श्रम में जिस प्रकार विश्राम होता है उसी प्रकार आराम की अवस्था में शरीर में
कार्य होता है। इसके कारण मन उत्तेजित अवस्था में रहता है। यह विश्राम की
त्रुटिपूर्ण स्थिति है। विश्राम की अवस्था में शारीरिक शिथिलता आवश्यक है जिसे
प्राकृतिक चिकित्सा की भाषा में आरोग्यमूलक शिथिलता कहा जाता है।
विश्राम भी एक साधना है जिसकी अपनी पद्धति है। इसके लिए शरीर व मन दोनों को
एकाग्र करना आवश्यक है। उसके बाद पीठ के बल सीधा लेट जायें। दोनों हाथों को
क्रमवार ऊपर ले जायें और बिस्तर पर इस तरह गिरायें जैसे वह टूट कर गिर गया
हो। उसी प्रकार दोनों पैरों को पूरा फैला लें। फिर इन्हें समेट कर ऊपर ले आएं।
द्घुटनों से छाती स्पर्श हो। फिर इन्हें समेट कर ऊपर ले आएं। द्घुटनों से छाती
स्पर्श हो।
धीरे-धीरे द्घुटनों को माथे से स्पर्श करें। ध्यान देने वाली बात है कि रीढ़
की हड्डी पूर्ण रूप से फैल जाये। फिर पैर व सिर को पुनः पूर्वस्थिति में नीचे
ले आकर इस प्रकार रखें जैसे वे निष्प्राण हों। फिर दोनों हाथों को पेट के ऊपर
शिथिल अवस्था में रखें और एक पैर की एड़ी को दूसरे पैर के ऊपर शिथिलता से चढ़ा
दें। इस प्रक्रिया से आश्चर्यजनक शान्ति महसूस होगी। निद्रा स्वतः ही द्घेर
लेगी। किसी योगी ने ठीक ही कहा हैः- जैसे नल खोल देने से पानी की धरा अबाध गति
से बहने लगती है वैसे ही शरीर को शिथिल कर देने से सारे स्नायुओं में शक्ति
धारा बहने लगती है।''
पूर्ण विश्राम सभी बीामारियों का अचूक इलाज है। बुखार की अवस्था में तो
विश्राम अपरिहार्य है। किसी प्रकार का दर्द हो या हृदय रोग, ब्लडप्रेशर, आंत
सम्बन्धी रोग, खांसी, जुकाम सभी रोगों में विश्राम से आराम होता है। विश्राम
खासकर स्नायुविक रोगों में ज्यादा फायदेमंद होता है। रोजाना पूरे दिन का एक
द्घंटा भी शरीर को शिथिल कर आराम करने से तुतलापन दूर हो सकता है। वास्तव में
विश्राम से ही दीर्द्घ जीवन प्राप्त होता है। कहते हैं कि किसी चीज की अधिकता
भी ठीक नहीं। इसका भी ध्यान रखना जरूरी है। मनुष्य को सदा यह ज्ञात होना
चाहिए कि विश्राम व आलस्य एक बात नहीं है। आरोग्य विश्राम का अर्थ ही है
मेहनत के बाद आराम। जो विश्राम श्रम का अनुसरण नहीं करता, शरीर की निष्क्रियता
को लम्बा बनाता है, वह विश्राम नहीं, आलस्य है। अतः आप आलस्य और थकान में
चुनाव करते हैं तो थकान को ही चुनें क्योंकि ''इट इज बेटर टु वीयर आऊट देन टू
रेस्ट आऊट।''
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