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   स्वास्थ्य
   जोड़ों के दर्द से रहें दूर
 

जैसे-जैसे आधुनिकता एवं निजीकरण बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे प्रदूषण में भी बढ़ोतरी हो रही है। बढ़ते प्रदूषण का सीधा असर मौसम के मिजाज पर पड़ता है, जिसके कारण गर्र्मियों में सामान्य से अधिक गर्मी तथा सर्दियों में अधिक सर्दी पड़ने लगी है। इस बदलते मौसम का प्रभाव सबसे अधिक उस आबादी पर पड़ता है जो वृद्धावस्था की तरफ बढ रही है। जैसे-जैसे वातावरण में ठंड बढ़ती जाती है वैसे-वैसे उनके जोड़ों का दर्द भी बढ़ता जाता है।

   
 

इन लोगों में जोड़ों के दर्द का कारण आम तौर पर आर्थराइटिस या गठिया होता है। ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती जाती है, त्यों-त्यों शरीर के अंगों में शिथिलता आती जाती है। उनका लचीलापन द्घटने लगता है। ध्यान न देने से जोड़ द्घिस जाते हैं तथा धीरे-धीरे जोड़ विकृत स्थिति को प्राप्त होने लगाते हैं। इससे ग्रस्त व्यक्ति की क्रियाशीलता में भी भारी कमी आ जाती हैं तथा रोगी असहनीय पीड़ा से ग्रस्त होकर लंगड़ाकर चलने लगता है।

अब प्रश्न यह उठता है कि जाड़ों में जोड़ों का दर्द क्यों बढ़ता है?इसके जवाब में विभिन्न विशेषज्ञों की भिन्न-भिन्न राय है। एक समूह के अनुसार जाड़े के मौसम में जैसे-जैसे तापमान में कमी होती है, किसी जोड़ विशेष में रक्त वाहिनियों के संकुचित होने से उस हिस्से में रक्त का तापमान कम हो जाता है जिससे जोड़ में अकड़ाहट बढ़ती है तथा दर्द होने लगता है। विशेषज्ञों का दूसरा समूह इस प्रश्न के उत्तर में वायुमण्डलीय दवाब का तर्क देते हुए कहता है कि इसमें कमी आने से रक्त धमनियों की दीवार के तनाव में कमी आती है, जिस कारण धमनियां फैल जाती हैं तथा दर्द और सूजन बढ़ जाते हैं। इसके अलावा सर्दियों में बढ़ी हुई आर्द्रता (हयूमिडिटी) के कारण तंत्रिकाओं में संवेदना की क्षमता निश्चित रूप से बढ़ जाती है जिससे जोड़ों में दर्द अधिक महसूस होता है जबकि गर्मियों में इसके उल्टे सिद्धान्त के कारण दर्द कम महसूस होता है।
ऑस्टियोआर्थराइटिस सभी आर्थराइटिस में सबसे अधिक पाया जाने वाला रोग है जो 40 वर्ष के ऊपर की आयु वाले लोगों विशेषकर महिलाओं को प्रभावित करता है। यह रोग आमतौर पर शरीर के सभी वजन सहने वाले जोड़ों विशेषकर द्घुटनों के जोड़ों को प्रभावित करता है। रोग के बढ़ने के साथ-साथ रोगी की टांगों का टेढ़ापन तथा द्घुटनों के बीच की दूरी बढ़ने लगती है। सीढ़ियां चढ़ने-उतरने तथा अधिक दूर चलने में दर्द होता है, रोगी लंगड़ाकर चलने लगता है। धीरे-धीरे रोग इतना गंभीर रूप ले लेता है कि रोगी के पास जोड़ प्रत्यारोपण कराने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता।
वातावरण के तापमान में कमी आने के साथ-साथ आर्थराइटिस से पीड़ित रोगी के लक्षणों की तीव्रता में बढ़ोतरी होने लगती है। इससे बचने के लिए रोगी दर्दनिवारक दवायें अधिक मात्राा में सेवन करने लगते हैं, तरह-तरह के मलहम, तेल इत्यादि लगाते हैं, परन्तु कोई लाभ नहीं होता। इन कारणों से सर्दियों का मौसम जोड़ों के दर्द से ग्रसित लोगों के लिए चिंता का विषय बन जाता है।
अब तक यह माना जाता रहा है कि हर सर्दियों में आर्थराइटिस के रोगी को जोड़ों में दर्द रूपी पीड़ा सहन करनी पड़ती है तथा यह रोग दमा तथा मधुमेह की तरह ही दम के साथ हो जाता है परन्तु बोन जोइन्ट केयर फाउन्डेशन आफ इण्डिया (।-74 सरिता विहार, दिल्ली, फोन .26972566 के निदेशक व वरिष्ठ हड्डी-जोड़ रोग तथा जोड़ प्रत्यारोपण विशेषज्ञ डॉ. सुभाष शल्य के अनुसार उचित योग व व्यायाम, पौष्टिक खान-पान, रहन-सहन में परिवर्तन, आधुनिक दवाओं तथा सामान्य शारीरिक वजन से जोड़ों में ही नहीं बल्कि लंबे समय तक के लिए जोड़ों के दर्द से न सिर्फ छुटकारा पाया जा सकता है, बल्कि भविष्य में होने वाली सर्जरी से भी कुछ हद तक बचा जा सकता है।
डॉ. सुभाष शल्या ने अपने 20 वर्षों के अनुभव के बाद इन्हीें सिद्धान्तों पर निर्धारित पूर्णतः नानसर्जिकल तकनीक का विकास किया है, जिससे आर्थराईटिस को रोका तथा वापस (रिवर्स) किया जा सकता है। यह अत्यंत कारगर तकनीक 'आर्थराइटिस रिवर्सल प्रोग्राम' के नाम से जानी जाती है।
स्वयं एक सफल जोड़ प्रत्यारोपण शल्य चिकित्सक होने व दिल्ली के इन्द्रप्रस्थ अपोलो हास्पिटल में आठ वर्षों तक सफलतम प्रैक्टिस करने के साथ-साथ डॉ. सुभाष शल्या (मो0-98101.24433) आर्थराइटिस जैसे आम रोग के लिए एक 'शल्य चिकित्सा रहित' पद्धति का विकास करना चाहते थे क्योंकि बहुत से मरीज कई कारणों जैसे कम उम्र, दिल की बीमारी, उच्च रक्तचाप, मधुमेह या आर्थिक कमजोरी से शल्य चिकित्सा (जोड़ प्रत्यारोपण) नहीं करवा सकते।
डॉ. सुभाष शल्या के अनुसार सामान्य लोगों में कूल्हां द्घुटना तथा पैर का केन्द्र बिन्दु एक सीधी रेखा में होते हैं, जिसे टांग का 'नार्मल एलाइनमेन्ट' कहते हैं। यह एलाइनमेन्ट आर्थराइटिस के रोगियों में धीरे-धीरे भंग होने लगता है जिस कारण उनकी टांगें टेढ़ी होने लगती हैं तथा दर्द बढ़ने लगता है। इसे वापस ठीक करने के लिए उनके द्वारा विकसित विशेष उपकरणों का प्रयोग करके कुछ विशेष क्रियायें करायी जाती हैं जिससे टेढ़ी टांगें सीधी होने लगती हैं व दर्द कम होने लगता है और चाल सुधरने लगती है।
मांसपेशियों को मजबूत करके जोड़ों की सक्रियता व स्थिरता बढ़ाई जाती है, जोड़ों में रक्त प्रवाह सुचारू किया जाता है ताकि जोड़ों पर जाड़ों का प्रभाव नहीं पड़े। रोगी के सम्पूर्ण शरीर, रक्त व हड्डियों की पूर्णं जांच कर उनके आधार पर रोगी के खान-पान में बदलाव लाकर आवश्यकतानुसार संतुलित एन्टी आक्सीडेन्ट युक्त भोजन दिया जाता है, साथ ही अत्याधुनिक कार्टिलेज बनाने वाली तथा जोड़ों की चिकनाई वापस लाने वाली दवाओं का समुचित प्रयोग करने से रोगी को अत्यधिक आराम मिलता है।
इस प्रोग्राम से बढ़े हुए वजन, रक्तचाप, मधुमेह, ऑस्टियोपोरोसिस को काफी हद तक नियन्त्रित किया जा सकता है। इससे रोगी का वजन एक माह में लगभग दस किलोग्राम तक कम हो सकता है जिससे रोगी स्वयं को जवान महसूस करता है। इस प्रोग्राम की सक्ष्मता के कारण ही अब जोड़ों के दर्द के रोगी जाड़ों सहित सभी मौसमों में दर्द रहित सक्रिय जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

 
 

 

 

     
     
 
 
 

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