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   स्वास्थ्य
   दिल पर आद्घात कहीं जिन्दगी की शाम न बन जाये
 

निहायत ही नाजुक किस्म की चीज का नाम है ''दिल''। शीशे के मानिन्द नजाकत और नाजुकता रखने वाला यह ''दिल'' शरीर के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक है। यौवन की दहलीज पर जब शरीर में कुछ-कुछ होने लगता है तो यह धड़कता है। अपरिपक्व उम्र के किसी मोड़ पर कभी बहकता है तो कभी किसी अमानवीय पीड़ा और पीड़ादायी द्घटना से दहल जाता है।
  यह दिल ही है जो जिन्दगी के तमाम आद्घात प्रतिद्घातों को सहते हुए अपने अन्दर दर्द का सैलाब होने के बावजूद अपनी कठोरता के कारण मनुष्य को दृढ़ बनाये रखता है और जब कभी सहनशक्ति से बाहर कोई आद्घात हृदय पर होता है

 
 

 जो यही हृदयाद्घात जिन्दगी की शाम में तब्दील हो जाता है। सचमुच इस निहायत ही नाजुक ''दिल'' की किफायत और सावधानी के साथ सुरक्षा बहुत ही जरूरी है। जिन्दगी की शाम होने में वे कारण भी शामिल हैं जो आदमी की लापरवाही के कारण इस हालात को पैदा करते हैं।

  आखिर यह दिल क्या है? किस तरह से यह शरीर में काम करता है? दिल की संरचना में किस प्रक्रिया के अभाव में रोगों की उत्पत्ति होती है? मनुष्य इन रोगों के निदान और उन्मूलन में किस तरह के उपायों में सफल हो सकता है। इन्हीं कुछ बिन्दुओं पर हाल ही में लेखक ने हृदय और हृदय रोग से जुड़े कुछ विशेषज्ञों से जानकारी हासिल की। दिल यानी हृदय एक विशेष प्रकार की मांसपेशी है जो हमारे सीने में मध्य भाग में तथा बांये भाग में होती है। दिल यानी हृदय यानी शरीर की धड़कन एक पम्प का कार्य करते हुए हमारे शरीर में है जिन्हें ''कोरोनरी'' धमनियां कहते हैं और जब ये धमनियां तंग हो जाती हैं या इनमें खून का चक्का जाम हो जाता है तो हृदय के कुछ हिस्से में रक्त संचार बन्द हो जाता है। इसे ही 'हार्ट अटैक' यानी हृदयाद्घात कहते हैं।
साधारणतयाः दिल की कोरोनरी धमनियों के बन्द होने या इन धमनियों में कोलेस्ट्रोल ;चर्बीद्ध जमने के कारण ही दिल के रोगों की उत्पत्ति होती है। इन धमनियों के बन्द होने की स्थिति से जुड़े कारणों को हम दो भागों में विभाजित कर सकते हैं एक-''वे, जिन्हें बदला नहीं जा सकता मसलन बढ़ती आयु, सेक्स और परिवार में किसी सदस्य को हृदय रोग होना। हृदयरोग की बीमारी पारिवारिक होने की संभावना अक्सर रहती है। वंशानुगत प्रभाव की संभावना को नहीं नकारा जा सकता। दूसरे वे, जिन्हें बदला जा सकता है मसलन धूम्रपान, शूगर का होना, उच्च रक्तचाप, खून में चर्बी की मात्रा का बढ़ना। मोटापा-विशेष रूप से शरीर के मध्य भाग का, खांसी, दमा, सांस जैसे रोगों की उत्पत्ति अधिकांशतः धूम्रपान से ही जुड़ी हुई है।
जिन्दगी के विभिन्न हिस्सों से जुड़ी सुख-दुःख, भावुकता, व्याकुलता इत्यादि की छाया ही सबसे ज्यादा हृदय को प्रभावित करती है। मानसिक तनाव, अड़ियल रवैया, उग्र स्वभाव, रिश्तों में तनाव तथा सनकी लोगों में हृदयाद्घात का खतरा अधिकांशतः बना रहता है।
हृदयाद्घात के मुख्य लक्षणों में पसीना आना, द्घबराहट, सांस फूल जाना, उल्टी आना, दिल मचलना, धड़कन तेज होना, बेहोश हो जाना इत्यादि शामिल हैं। डॉक्टरों के अनुसार इन्हीं लक्षणों का अतिरेक मृत्यु जैसी स्थिति में भी पहुंचा देता है। मेडिसन के एक सर्जन डा. एस. लाल बताते हैं कि हृदयाद्घात का दर्द, छाती के मध्यभाग, बांये या दांये या दोनों बांहों में, गर्दन, निचले जबडे़ या दांत में, पेट की ओर या कमर में जा सकता है।
और छाती में दर्द का कारण भी दीगर अन्य कारणों से हो सकता है। कई बार बिना छाती के दर्द के भी हार्ट अटैक होने की स्थितियां पैदा हो जाती हैं लेकिन विशेषज्ञों की राय है कि छाती में तेज दर्द होने पर महज अमानवीय व्यवहार और लापरवाही के कारण ही कई लोग अकाल काल के ग्रास बन जाते हैं।
ऐसी स्थिति में मानवीय धर्म को निभाते हुए पीड़ित व्यक्ति को चलने फिरने से रोक कर उसे तुरन्त बिस्तर पर लिटा देना चाहिये। ऐसी आपात्‌ स्थिति में पीड़ित व्यक्ति के लिए मानवीय सांत्वना के अलावा डिस्प्रीन की आधी गोली सहायक सिद्ध होती है। पीड़ित व्यक्ति को सोरबिटे्रट की एक गोली जीभ के नीचे रखकर चूसने के लिए कहना चाहिये। इस प्राथमिक उपचार के बाद तुरन्त किसी विशेषज्ञ से सम्पर्क करने में कोताही किसी भी सूरत में नहीं की जानी चाहिये। सवाल मुख्यतः जिन्दगी के जोखिम से जुड़ा है।
अलबता हृदयरोग, हृदयाद्घात के कारण कोई भी रहें लेकिन धूम्रपान के सेवन पर सख्ती से रोक लगाकर, ब्लड प्रेशर को सामान्य रखते हुए, खून की बढ़ी चर्बी की मात्राा की समय-समय पर जांच करवाकर इन रोगों पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। शराब बहुत ही संयमित मात्राा में लेकर और हो सके तो बिल्कुल ही छोड़कर स्वास्थ्य लाभ पाया जा सकता है। चिकनाईयुक्त पदार्थ भी इन रोगों में खतरनाक हैं। नियमित व्यायाम, संतुलित व संयमित आहार, नियंत्रिात वजन, तनाव सहित माहौल और योगाभ्यास इस रोग के निदान में अचूक औषधि का काम करते हैं।
अंततोगत्वा दिल यानी हृदय बहुत ही नाजुक और नजाकतभरी शारीरिक चीज है जिसकी सुरक्षा, संभाल हमारा कर्तव्य है। शरीर रूपी मशीन के इस महत्वपूर्ण यन्त्रा की हर हाल, हर कीमत पर सुरक्षा होनी चाहिए। विभिन्न सरकारों में देश की स्वास्थ्य नीति जहां आम जनमानस से दूर, आम आदमी के व्यापक हितों से बहुत दूर रही है, ऐसे में उपभोक्तावादी युग में जहां पेशेवर डाक्टरों की भारी भरकम फीस ने भी उपचार को एक आम गरीब आदमी के बूते से बाहर कर दिया है। यह दायित्व उन सामाजिक संगठनों पर है जो जहां तहां मानव सेवा को अपना लक्ष्य मानकर कार्यरत हैं। उपचार के अभाव में ऐसे आम लोगों की जिन्दगियों में शाम होने से बचायें ताकि दिलों में उठे वलवले कायम रहकर जिन्दगी को रंगीन रहने दें।

 
 

 

 

     
     
 
 
 

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