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   स्वास्थ्य
   स्वास्थ्य के लिए घातक  हो सकती है बेमौसमी सब्जियां
 

आज के समय में बेमौसमी सब्जियों का प्रयोग अभिजात्य वर्ग संस्कृति का एक आवश्यक अंग बन गया है। थोड़ी मात्राा में ही सही, दैनिक खाद्य सामग्री में बेमौसमी साग-सब्जियों की भागीदारी आज शारीरिक आवश्यकता पूर्ति के बजाय खान-पान के ऊंचे मापदण्ड अथवा प्रतिष्ठा प्रदर्शन का माध्यम बन गयी है।

   
 

मनचाही साग-सब्जियों के प्रति उपभोक्ताओं का आकर्षण स्वाभाविक भी है। अगर यही सब्जियां निर्धारित मौसम के अलावा अन्य मौसमों में भी अपने आकर्षक रंग-रूप अथवा आकार-प्रकार के साथ आपके सामने आ जायें तो भला आप अपने आपको उनका उपभोग करने से कैसे रोग पायेंगे चाहे इनके क्रय की प्रक्रिया में आपको दो से चार गुनी कीमत ही क्यों न चुकानी पड़े?

परन्तु आप ऐसा करते समय क्या यह सोच पाते हैं कि आप मुंहमांगी कीमत देकर जो बेमौसमी सब्जियां खरीदते हैं, वे किस हद तक आपके शरीर के लिए द्घातक सिद्ध हो सकती हैं?शायद नहीं सोचते। इनके प्रयोग के प्रति सचेत होकर आप न सिर्फ आर्थिक क्षति से ही बच सकते हैं बल्कि अनेक बीमारियों से भी स्वयं तथा अपने परिवार को बचा सकते हैं।
अधिकाधिक आर्थिक लाभ अर्जित करने की गरज से ही प्रायः इन साग-सब्जियों का असमय उत्पादन सहज सम्भव होता है। अधिक आय तभी संभव है, जब फसल उत्पादन पर कम से कम प्रतिकूल प्रभाव पड़े और अनुकूल उत्पादन के लिए न केवल अधिकाधिक रसायनिक उर्वरकों एवं सिंचाई की आवश्यता होती है बल्कि अपेक्षाकृत द्घातक कीटनाशकों के प्रयोग भी इसके लिए अनिवार्य बन जाते हैं।
प्रायः बैंगन, भिण्डी, तोरई, लौकी, शिमला मिर्च, हरी मिर्ची आदि सब्जियों की तुड़ाई अवधि में वैज्ञानिकों द्वारा संस्तुत रसायनों का, उनकी मात्राओं, प्रयोग विधियां अथवा समय अन्तराल को नजर अंदाज करते हुए फल-सब्जी उत्पादक अपने तात्कालिक लाभ को ही दृष्टि में रखते हुए प्रयोग करते हैं। प्रयोग हेतु वर्जित अवधि में भी बाजार की मांग एवं आर्थिक लाभ को देखते हुए फलों की तुड़ाई शुरू कर देते हैं और अंततः सामान्य उपभोक्ता इसके दुष्परिणामों को झेलने को अभिशप्त हो जाते हैं।
अधिकाधिक बेमौसमी सब्जियां पहाड़ी भागों में जहां वर्षा कम होती है या शुष्क खेती की जाती है, उगायी जाती है। इनकी रोपाई बाजार मांग के अनुरूप फरवरी से जून मास तक विभिन्न चरणों में की जाती है ताकि मई से अक्टूबर मास तक निरन्तर इनकी आपूर्ति की जा सके। सामान्यतः एल्ड्रिन, एल्डीकार्ब, बी. एच. सी, बिना एक्रिल, कार्बारिल, कार्बोफ्यूरान, क्लोरेडेन, हैण्टाक्लोर, डी.डी.टी. डाइकोफाल, डारमेथोएट, एण्डोसल्फान, मैलाथियान, लेप्टोफॉस, फिस्फोमिडान, पाइरेथ्रिक्स आदि कीटनाशी समयानुसार प्रयोग में लाये जाते हैं। इन रसायनों के प्रयोग के बाद एक सप्ताह से लेकर 60 दिन तक की अवधि उत्पादों के प्रयोग हेतु वर्जित मानी गयी है लेकिन इतना सब्र हमारे उत्पादकों को कहां है?वे तो जल्दी से आपको बेमौसमी सब्जियां देकर अपनी जेबें भारी करना चाहते हैं।

 

 
 

 

 

     
     
 
 
 

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