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हम अपने पढ़ने वाले के ज्ञान के लिए
बता दे कि पूजा स्थल पर मूर्तिया स्थापित करते समय उनका मुख किस किस दिशा में
होना चाहिए। पूजा के लिये जैसा हमने पहले लिखा कि इशान कोण सर्वाधिक उत्तम
माना गया है। क्योंकि उत्तर व पूर्व से आने वाली ऊर्जा मन व मस्तिष्क को
एकाग्रचित रखती है जो कि पूजा पाठ के लिए बहुत जरूरी है। इसी प्रकार चित्र,
मूर्ति या प्रतिमा का भी मुख दिशा विशेष की ओर रखने का अपना महत्व है। ब्रह्मा,
विष्णु, शिव, कार्तिकेय, इन्द्र इत्यादि की मूर्तियों या चित्रों का मुख,
पूर्व या पश्चिम की ओर रखना चाहिए। गणेश, कुबेर, षेडसी मातृकाओं का मुख सदैव
दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए व हनुमान जी की मूर्ति या चित्र का मुख सर्वदा
नैऋत्य दिशा की ओर होना चाहिए। इन सभी दिशाओं की ओर मुख निर्धारित करने के
पीछे कुछ वैज्ञानिक तथ्य है ऐसा वास्तु शास्त्र का मानना है। यदि पूजा इत्यादि
इशान दिशा में होगी तो उत्तर से बहने वाली चुम्बकीय तरंगे मानव के मन मस्तिक
को एकाग्रचित रखती है और इसी से गति मिलेगी जो ध्यान व आत्मिक शांति के लिए
बहुत जरूरी है।
वास्तु का मानव जीवन से सम्बन्धः
जिस प्रकार आज के युग में ज्योतिष मानव जीवन मे अपना स्थान स्थापित कर चुका
है, उसी प्रकार आज के समय में वास्तु शास्त्र भी मानव जीवन मे महत्वपूर्ण
स्थान ग्रहण कर चुका है। क्योंकि मानव जीवन का कोई भी ऐसा पहलू नही है जो
वास्तु शास्त्र से प्रभावित न हो। यह तो अब माना जाने लगा है कि मकान की
बनावट, उसमें रखी जाने वाली चीजें और उन्हे रखने का तरीका जीवन को बना व
बिगाड़ सकता है। कुछ समय पहले वास्तु शास्त्र का उपयोग सिर्फ धनाढ़्य व्यक्ति
अपनी फैक्टरियों व कोठियां आदि बनवाने में करते थे, परन्तु आज एक साधारण
व्यक्ति भी इस बारे में जानकारी रखता है और उसकी कोशिश रहती है कि वह अपना
भवन वास्तु शास्त्र की दिशा निर्देश के अनुसार करवाए, ताकि भविष्य मे आने वाले
दुःख तकलीफ का निवारण कर सके। वास्तु शास्त्र के सिद्धान्तों मे प्रकृति के
साथ तालमेल बढ़ाने के कई तरह के उदाहरण मिलते है। वास्तु शास्त्र की यह कोशिश
रहती है कि प्रकृति के नियमों के खिलाफ कोई काम न करे ताकि किसी प्रकार का
कोई दण्ड न मिलें। वास्तु का एक उत्तम प्रमाण अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रपति
श्री बिल क्लिंटन है जो कि वास्तु शास्त्र का लोहा मानते हैं। अपने कार्यकाल
मे उन्होने अपने ऑफिस में बैठने की दिशा बदल कर और अपने आवास को उत्तर दिशा
वाली खिड़की में मोमबत्ती जला कर रखने से अपनी जीवन में सुखद अनुभूति महसूस
की। इससे सिद्ध होता है कि वास्तु शास्त्र का प्रचलन पश्चिमी देशों में भी है
तभी तो वहां के लोग सुख व शान्ति से रहते है। वास्तु का मनुष्य की राशी में
ग्रहों से भी बहुत निकट का सम्बन्ध है। इसका विवरण हम नीचे अलग से दे रहे
हैं।
वास्तु का ग्रहों से सम्बन्धः- जैसा कि हम पहले भी लिख चुके है कि वास्तु और
ज्योतिष का चोली दामन का सम्बंध है इसमें कुछ भी झूठ नहीं है, क्योंकि ग्रहों
का प्रभाव भवन निर्माण पर पड़ता है। जिस तरह मानव जीवन पर शुभ और अशुभ ग्रहों
का प्रभाव पड़ता है, ऐसा ही प्रभाव निर्जीव वस्तुओं पर भी पड़ता है। उदाहरण के
लिए जिस प्रकार चन्द्रमा के बढ़ने व घटने का प्रभाव समुद्र पर पड़ता है और इसी
प्रभाव के कारण ज्वार भाटा उठता है। इससे सिद्ध होता है कि वास्तु जैसी
निर्जीव वस्तुओं पर भी ग्रहो का प्रभाव पड़ता है और वह इन ग्रहों के प्रभाव से
नही बच सकती। इस का उदाहरण इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि एक ही जगह पर दो
पत्थर पड़े हुए हैं और जिस पर ग्रहों का शुभ प्रभाव है वह देवता की मूर्ति के
लिए चुन लिया जाता है, परन्तु बुरे ग्रह के प्रभाव के कारण दूसरे पत्थर को
सीढ़ियों के लिए भी जगह नही मिलती। इन दो उदाहरणों से यह सिद्ध होता है कि
ग्रहों का प्रभाव निर्जीव वस्तुओं पर भी उसी प्रकार पड़ता है जिस प्रकार मानव
जीवन पर पड़ता है। जैसा कि हम पहले लिख चुके है कि वास्तु एवं ज्योतिष के
अनुसार आठ दिशाएं है और हर दिशा एक निश्चित ग्रह के अधीन होती है और उनका
दिशाओं पर एक विशेष प्रकार का प्रभाव रहता है। कौन-कौन सी दिशा में किस-किस
ग्रह का प्रभाव विशेष रूप से पड़ता है यह हम निम्नलिखित सारिणी द्वारा बता रहे
है।
ग्रहों के द्वारा द्घर के मालिक व परिवार के सदस्यों पर पड़ने वाले प्रभाव का
विवरण इस प्रकार है।
1.सूर्यः-
सूर्य क्योंकि पूर्व दिशा से निकलता है, इसीलिए उसका आधिपत्य इस दिशा में रहता
है। जिस भवन का मुख्य प्रवेश द्वार पूर्व की आरे होगा उस भवन में रहने वाले
लोग श्रेष्ठ व्यक्तित्व वाले, ओजस्वी एवं समृद्ध होंगें। ऐसे लोंगों की वृद्धि
अति तेज होगी और उनका लग्न सिंह होता है। ऐसे व्यक्तियों को कड़वी चीजे बहुत
पसन्द होती है। अतः वह मेथी, करेला आदि सब्जियों के बहुत शौकीन होते है।
2.चन्द्रः-
चन्द्र का स्वामित्व भवन के वायव्य दिशा में होता है। क्योंकि वायु कभी भी एक
जगह नही ठहरती है, इसलिए जिस भवन का द्वार इस दिशा में होगा उस गृह का स्वामी
व गृह में रहने वाले लोगों का स्वभाव चंचल, अस्थिर तथा भावावेश में बहने वाला
होगा। ऐसे लोग सैर सपाटे, यात्रा व मौजमस्ती के शौकीन होते है। हरी सब्जियां
उन्हे बहुत पसन्द होती है और नमकीन के बहुत शौकीन होते है।
3.मंगलः-
मंगल उस भवन का स्वामी होता है जिसका द्वार दक्षिण दिशा मे हों। इस ग्रह का
स्वामी कर्मनिष्ट, साहसी निडर एवं निर्भीक होता है। वह स्वभाव से कुछ चंचल भी
होता है। ऐसे व्यक्तियों की पंसद गरिष्ट व मसालेदार भोजन होता है।
4.बुधः-
जिस भवन का प्रवेशद्वार उत्तर दिशा मे होता है उसका स्वामी बुध को माना जाता
है। बुद्ध अपने प्रभाव द्वारा ग्रह स्वामी को बुद्धिचातृर्य एवं विनोद प्रदान
करता है, जिस कारण मानव अपने बुद्धिबल पर प्रसिद्धि पाता है और उसका कार्य
क्षेत्र लेखन एवं साहित्य से जुड़ा होता है। ऐसे लोग नियमों एवं अनुशासन का
बहुत सख्ती से पालन करते है। वह किसी भी भोजन को प्राथमिकता नहीं देते। उन्हे
जो मिल पाता है उसी को संतोषपूर्वक ग्रहण कर लेते है।
5.गुरू(बुहस्पति):-
गुरू या बुहस्पति अपना आधिपत्य उस भवन पर जमाते है जिस भवन का मुख्य द्वार
ईशान दिशा में होता है। ऐसे भवन के गृहस्वामी का स्वभाव दयालु, धार्मिक व
विचारशील प्रकृति का होता है। ऐसे पुरूष धर्म के प्रति बहुत आस्था रखते हैं।
जरूरत पड़ने पर वह साहस का संचार भी कर लेते है और दुश्मन से लोहा लेने को
तैयार रहते हैं। अध्ययन, अध्यापन, भाषा एवं शिक्षा के क्षेत्रों मे खास रूचि
होती है। ऐसे लोग सात्विक एवं शुद्ध भोजन को ही ग्रहण करते है।
6.शुक्रः-
जिन भवनों का प्रवेश द्वार आग्नेय दिशा की ओर हो ऐसे गृहों का आधिपत्य ग्रह
शुक्र होगा। क्योंकि शुक्र का प्रभाव मौज मस्ती व विलास का प्रतिनिधित्व करता
है। अतः ऐसे गृहस्वामी विलासी व मौजमस्ती करने वाले होगे। ऐसे व्यक्ति कठिन
दौर मे भी अपने मनोरंजन के लिए पर्याप्त समय निकाल लेते है और अपनी आमदनी का
ज्यादा हिस्सा ऐसे कार्यो पर व्यय करते है। वे स्वभावतः कला प्रेमी होते है
एवं रसिक प्रवृति के होने के कारण इनका पहनावा तड़क भड़क वाला होता है। सुन्दर
दिखने के लिए ऐसे मानव अनेक उपक्रम करते है। इन लोगो की पसन्द दही, पनीर, एवं
खट्टे पदार्थ होते है।
7.शनिः-
शनि ग्रह स्वभाव से कठोर एवं गंभीर माने जाते है। अतः एव ऐसे भवन जिनका मुख
पश्मिच दिशा में होता है और मुख्य द्वार भी इसी दिशा में हो तो उसका स्वामी
शनि को माना गया है। इस ग्रह के प्रभाव से गृहस्वामी ठहराव, गंभीरता से विचार
करते है और नफे नुकसान को ध्यान मे रखकर कार्य करते है। अपने मिलने जुलने वालो
मे ऐसे लोगों की छवि गंभीर व्यक्ति वाली बन जाती है। ऐसे लोग गरिष्ट, तले
पदार्थो व ठंडे पेयजल के अधिक शौकीन होते है।
8.राहुः-
राहु का आधिपत्य नैऋत्य दिशा मे होता है और जिस भवन का मुख्य द्वार इस दिशा
मे हो तो इस ग्रह का उस पर पूर्ण प्रभाव होगा। राहु क्योंकि तामसी प्रवृति का
माना गया है अतः एव ऐसे भवन का गृहस्वामी मूलतः तामसिक, द्घमण्डी, लुच्चा एवं
धूर्त होगा। गुस्सा करना उसकी दिनचर्या का एक हिस्सा बन जाता है। मांस, मछली,
गरिष्ट एवं बासी भोजन इनकी प्रथम पसन्द होती है।
कोई ग्रह विशेष अपना प्रभाव किस प्रकार रखता है यह उपरोक्त व्याख्या से
स्पष्ट हो जाता है। कई लोगों के मन में भ्रम उठता है कि अगर किसी भवन के एक
से अधिक प्रवेश द्वार भिन्न-भिन्न दिशाओं मे हो तो उस पर किस ग्रह का प्रभाव
होगा। ऐसे लोगो की जानकारी के लिए बता दे कि यदि किसी भवन के तीन द्वार का
प्रभाव हों तो उनका मिला जुला प्रभाव गृह स्वामी पर पड़ेगा। इसके अलावा खिड़कियों
एवं रोशनदानों की स्थिती भी अपना प्रभाव दिखाती है। अगर दिशाओं के ग्रह
प्रभावशाली एवं ताकतवर है तो वह द्घर मे सुख समृद्धि एवं शांति पूर्वक माहौल
बनाकर रखेगें और अगर उनका प्रभाव क्षीण है और नीच प्रभाव में है तो इसके उल्ट
असर दिखाएंगे।
उपरोक्त बातों से सिद्ध होता है कि ज्योतिष वास्तु के साथ-साथ चलता है और इनका
आपस मे गूढ़ संबंध है। यह दोनो एक दूसरे के बगैर अधूरे हैं। |
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