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दिशाओं का महत्वः वास्तु के अनुसार दिशाओं का भी भवन
निर्माण मे उतना ही महत्व है जितना कि पंच तत्वों का है। दिशांए कौन-कौन सी
है और उनके स्वामी कौन-कौन से है यह नीचे दिए जा रहे हैं। कहते हैं कि दिशा
व्यक्ति की दशा बदल देती है। यह बात वास्तुनुरूप बने भवन पर पूर्ण रूप से
सत्य साबित होती है। यदि किसी भवन निर्माण का दिशाओं के बिना ध्यान रखे
निर्माण किया जाए तो ऐसे भवन के स्वामी को अनेक कष्ट, दुखो का सामना करना पड़ता
है। हमें वस्तुतः चार दिशााओं का ज्ञान है जिस ओर से सूर्य उदय होता है उस ओर
पूर्व व जिस दिशा मे सूर्य अस्त होता है उसे पश्चिम कहा जाता है। अगर पूर्व
की ओर मुंह करके खड़े हो जाए तो बायीं ओर उत्तर व दाहिनी ओर दक्षिण दिशा होती
है।
वास्तु विज्ञान/शास्त्रों के अनुसार चार दिशाओं के
अतिरिक्त चार उपदिशाएं या विदिशाए भी होती है और यह चार है 1.ईशान 2.आग्नेय
3.नैऋत्य 4.वायव्य। इन विदिशाओं का भी वस्तु शास्त्र मे बहुत महत्व है समरागण
सूत्र में दिशाओं/विदिशाओं का उल्लेख इस प्रकार किया गया है।
1.पूर्वः- यह तो सभी जानते है कि सूर्य पूर्व दिशा में निकलता है और
सुबह की किरणों मे जीवनदायी पोषक तत्व होते है, जिनकी शरीर व वनस्पति को बहुत
आवश्यकता होती है। इस दिशा का स्वामी 'इन्द्र' हैं और इसे सूर्य का निवास
स्थान भी माना जाता है। अतः एवं यह स्थान मुख्यतः प्रमुख व्यक्ति या पितृ
स्थान माना जाता है अतः एवं इस दिशा को खुला व स्वच्छ रखा जाना चाहिए। इस दिशा
मे कोई रूकावट नहीं होनी चाहिए। यह दिशा वंश वृद्धि मे भी सहायक होती है। यह
दिशा अगर दूषित होगी तो व्यक्ति के मान सम्मान को हानि मिलती है व पितृ दोष
लगता है।
पूर्व दिशा का स्वामी 'इन्द्र है। यह कालपुरूष है। प्रयास करें कि इस दिशा मे
टायलेट न हो वरना धन व संतान की हानि का भय रहता है। पूर्व दिशा में बनी
चारदीवारी पश्चिम दिशा की चार दीवारी से ऊंची न हो, वरना संतान हानि का भय है
इस दिशा का प्रतिनिधी ग्रह सूर्य है।
2.पश्चिमः-
जब सूर्य अस्तांचल की ओर होता है तो वह दिशा पश्चिम कहलाती है। इस दिशा का
स्वामी 'वरूण' है और यह दिशा वायु तत्व को प्रभावित करती है और वायु चंचल होती
है। अतः यह दिशा चंचलता प्रदान करती है। यदि भवन का दरवाजा पश्चिम मुखी है तो
वहां रहने वाले प्राणियों का मन चंचल होगा। पश्चिम दिशा सफलता यश, भव्यता और
कीर्ति प्रदान करती है।
पश्चिम दिशा का स्वामी 'वरूण' है और इसका प्रतिनिधि ग्रह 'शनि' है। यदि ऐसे
गृह का मुख्य द्वार पश्चिम दिशा वाला हो तो गलत है। इस कारण ग्रह स्वामी की
आमदनी ठीक नहीं होगी उसे गुप्तांग की बीमारी होगी।
3.उत्तरः-
सूर्य के निकलते समय अगर उस ओर मुंह करके खड़े हो जाए तो हमारी बायीं तरफ की
दिशा उत्तर दिशा कहलाती है या इसे ऐसे भी ज्ञात किया जा सकता है कि जिस ओर
ध्रुव तारा है, वह दिशा उत्तर दिशा भी कहलाती है। इस दिशा का स्वामी 'कुबेर'
है और यह दिशा जल तत्व को प्रभावित करती है। भवन निर्माण करते समय इस दिशा को
खुला छोड़ देना चाहिए। अगर इस दिशा में निर्माण करना जरूरी हो तो इस दिशा का
निर्माण अन्य दिशाओं की अपेक्षा थोड़ा नीचा होना चाहिए। यह दिशा सुख सम्पति,
धन धान्य एवं जीवन मे सभी सुखों को प्रदान करती है। उत्तर मुखी भवन इसकी दिशा
का ग्रह 'बुध' है।
उत्तरी हिस्से में खाली जगह ने हो अहाते की सीमा के साथ सटकर और मकान हो और
दक्षिण दिशा मे जगह खाली हो तो वह भवन दूसरो की सम्पति बन सकता है।
4.दक्षिणः-
चढ़ते सूर्य की ओर मुंह करके खड़े होने से अगर बायीं ओर
उत्तर हो तो निश्चित दायीं ओर दक्षिण दिशा होनी चाहिए। आम तौर पर दक्षिण दिशा
को अच्छा नहीं मानते क्योंकि दक्षिण दिशा का यम का स्थान माना जाता है और यम
मृत्यु के देवता है अतः आम लोग इसे मृत्यु तुल्य दिशा मानते है। परन्तु यह
दिशा बहुत ही सौभाग्यशाली है। यह धैर्य व स्थिरता की प्रतीक है। यह दिशा हर
प्रकार की बुराइयों को नष्ट करती है। दक्षिण भारत में तिरूपति मन्दिर बहुत
प्रसिद्ध है दक्षिण दिशा मे स्थित होते हुए भी यह मन्दिर बहुत समृद्धशाली एवं
प्रसिद्ध है। इस मन्दिर की आय से दक्षिण भारत में कई शिक्षा संस्थान एवं
अनाथालय चलते है जिस कारण यह बहुत प्रसिद्ध है। अतः दक्षिण दिशा उतनी बुरी भी
नही है जितनी कि लोगो की धारणा है। भवन निर्माण करते समय पहले दक्षिण भाग को
कवर करना चाहिए और इस दिशा को सर्वप्रथम पूरा बन्द रखना चाहिए। यहां पर भारी
समान व भवन निर्माण साम्रगी को रखना चाहिए। यह दिशा अगर दूषित या खुली होगी
तो शत्रु भय का रोग प्रदान करने वाले होगी। इस दिशा का स्वामी यम है और ग्रह
मंगल है।
5.ईशानः-
पूर्व दिशा व उत्तर दिशा के मध्य भाग को ईशान दिशा कहा जाता है ईशान दिशा को
देवताओं का स्थान भी कहा जाता है। इसीलिए हिन्दू मान्यता के अनुसार कोई शुभ
कार्य किया जाता है तो द्घट स्थापना ईशान दिशा की ओर की जाती है। सूर्योदय की
पहली किरणे भवन के जिस भाग पर पड़े उसे ईशान दिशा कहा जाता है। यह दिशा विवेक,
धैर्य, ज्ञान, बुद्धि आदि प्रदान करती है भवन मे इस दिशा को पूरी तरह शुद्ध व
पवित्र रखा जाना चाहिए। यदि यह दिशा दूषित होगी तो भवन मे प्रायः कलह व
विभिन्न कष्टों को प्रदान करने के साथ व्यक्ति की बुद्धि भ्रष्ट होती है और
प्रायः कन्या संतान प्राप्त होती है। अतः भवन में इस दिशा का विशेष ध्यान रखना
चाहिए। इस दिशा का स्वामी 'रूद्र' यानि भगवान शिव है और प्रतिनिधि ग्रह 'बृहस्पति'
है।
6.आग्नेयः-
पूर्व दिशा व दक्षिण दिशा को मिलाने वाले कोण को अग्नेय कोण संज्ञा दी जाती
है। जैसा कि नाम से ही प्रतीत होता है। इस कोण को अग्नि तत्व का प्रभुत्व माना
गया है और इसका सीधा सम्बन्ध स्वास्थय के साथ है। यदि भवन की यह दिशा दूषित
रहेंगी तो द्घर का कोई न कोई सदस्य बीमार रहेगा। इस दिशा के दोषपूर्ण रहने से
व्यक्ति को क्रोधित स्वभाव वाला व चिडचिड़ा बना देगा। यदि भवन का यह कोण बढ़ा
हुआ है तो यह संतान को कष्टप्रद होकर राजमय आदि देता है। इस दिशा का स्वामी 'गणेश'
है और प्रतिनिधि ग्रह 'शुक्र' है। यदि आग्नेय ब्लॉक की पूर्वी दिशा मे सड़क
सीधे उत्तर की ओर न बढ़कर घर के पास ही समाप्त हो जाए तो वह घर पराधीन हो जाएगा।
7.नैऋत्यः-
दक्षिण व पश्चिम के मध्य कोण को नेऋत्य कोण कहते है। यह कोण व्यक्ति के
चरित्र का परिचय देता है। यदि भवन का यह कोण दूषित होगा तो उस भवन के सदस्यों
का चरित्र प्रायः कुलषित होगा और शत्रु भय बना रहेगा। विद्वानों के अनुसार इस
कोण के दूषित होने से अकस्मिक दुर्द्घटना होने के साथ ही अल्प आयु होने का भी
योग होता है। यदि द्घर में इस कोण में खाली जगह है गड्डा है, भूत है या
कांटेदार वृक्ष है तो गृह स्वामी बीमार, शत्रुओं से पीडित एंव सम्पन्नता से
दूर रहेगा। नेऋत्य का हर कोण पूरे घर मे हर जगह संतुलित होना चाहिए, अन्यथा
दुष्परिणाम भुगतना पड़ेगा। इस दिशा का स्वामी 'राक्षस' है और प्रतिनिधि ग्रह 'राहु'
है।
8.वायव्यः-
पश्चिम दिशा व उत्तर दिशा को मिलाने वाली विदिशा को वायव्य विदिशा या कोण कहते
है जैसा कि नाम से ही विदित होता है कि यह कोण वायु का प्रतिनिधित्व करता है।
यह वायु का ही स्थान माना जाता है। यह मानव को शांति, स्वस्थ दीर्घायु आदि
प्रदान करता है। वस्तुतः यह परिवर्तन प्रदान करता है। भवन मे यदि इस कोण मे
दोष हो, तो यह शत्रुता चपट हो तो, जातक भाग्यशाली होते हुए भी आनन्द नही भोग
सकता है। यदि वायव्य द्घर मे सबसे बड़ा या ज्यादा गोलाकार है तो गृहस्वामी को
गुप्त रोग सताएंगें। इस कोण का स्वामी 'बटुक' है और प्रतिनिधि ग्रह 'चन्द्रमा'
माना गया है।
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