FAQ     |    About us   |   Channels   |   Feedback 

  GREHSAHELI  

HOME                 PRODUCTS                 SERVICES                 RESELLER                 PROMOTION                 CONTACT

     
  वास्तु
   वास्तऔर आपका घर
 

भवन बनकर तैयार हो जाता है तो वह पंचभूत का रूप धारण कर लेता है। ईटो, मिट्टी, सीमेन्ट वगैरह से जब भवन बनकर तैयार हो जाता है तो लोग इसे निर्जीव समझते है लेकिन उनकी यह विचार धारा गलत है। दीवारे भी बाते करती है और सांस लेती है तभी तो कभी कोई गुप्त बात करनी हो तो लोग कहते है कि धीरे बात करें क्योंकि दीवारों के भी कान होते है। इन बातों से सिद्ध होता है कि हमारे पूर्वजों ने इस लकोक्ति को बनाते वक्त वास्तु शास्त्र का अध्ययन किया था। जो भी कर्म हम करते है उसका असर हमारे साथ-साथ, हमारे रहने वाले स्थान पर भी पड़ता है, क्योंकि पंचभूत हर इन्सान की देह(शरीर) मे विद्यमान है। मनुष्यों एवं बह्याण्ड की रचना पंच महाभूतों के आधार पर हुई है। यह पंचभूत है-पृथ्वी, आकाश, जल, अग्नि एवं वायु। हर स्त्री पुरूष के जीवन मे इनका बहुत महत्व है प्रकृति के विरूद्ध काम करने से इनका सन्तुलन बिगड़ जाता है और हमारी ऊर्जाएं गलत दिशांए अपना लेती है, जिससे अस्वस्थता पैदा होकर हमारे दिमागी व शारीरिक संतुलन को बिगाड़ देती है, और बैचेनी, तनाव अशान्ति इत्यादि को पैदा कर देती है। इसी तरह जब मनुष्य प्रकृति से छेड़छाड करता है तो उसका संन्तुलन बिगड़ जाता है तब तूफान, बाढ़, अग्निकांड तथा भूकम्प आदि अपना तांडव दिखाते हैं।
इसलिए यह जरूरी है कि पंच तत्वों का सन्तुलन बनाए रखा जाए ताकि हम शान्तिपूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर सके। जैसे कि ऊपर कहा गया है कि भवन निर्माण के बाद यह पंच तत्व गृह मे रहने लगते है, तब यह जरूरी हो जाता है कि इन सबका सही सन्तुलन बना रहे। अगर यह जरा भी बिगड़ जाए तो भवन मे निवास करने वाला मानव सुख-शान्ति से नहीं रह पाएगा। उसे सदैव अशान्ति, कलेश, आर्थिक तंगी, रोग तथा मानसिक द्वंद आदि समस्याएं हमेशा घेरे रहेगी। इन पंच तत्वों को जानने के लिए हमें इनके बारे मे अलग-अलग समझना होगा कि यह क्या है और इनका मनुष्य व ब्रह्याण्ड पर किस प्रकार असर पड़ता है। पंच तत्वों का संक्षेप से वर्णन इस प्रकार है।
1. पृथ्वी
पृथ्वी सौरमण्डल के नवग्रहों मे से एक है। सूर्य के अंश से टूटकर यह लाखों वर्ष पूर्व उसका प्रादुर्भाव हुआ था। कहते है कि अन्य ग्रह भी इसी प्रकार उत्पन्न हुए थे। सूर्य से टूटने के बाद यह उसके इर्द-र्गिद चक्कर काटने लगे और धीरे-धीरे यह सूर्य से दूर हो गए। इसी प्रकार पृथ्वी भी सूर्य से दूर हो गई और धीरे-धीरे ठंडी हो गई। पृथ्वी पर लम्बे समय तक रसायनिक क्रियाओ के फलस्वरूप प्राकृतिक स्थलों, पर्वतों, नदियों व मैदानों आदि का जन्म हुआ। पृथ्वी सूर्य के गिर्द चक्कर काटने के साथ-साथ अपनी धुरी पर भी 23 डिग्री मे घूम रही हैं। यहां पानी, गुरूत्वाकर्षण शक्ति तथा दक्षिणोत्तर धु्रवीय तरंगे पृथ्वी की सभी जीव-निर्जीव वस्तुओं को प्रभावित करती है। पृथ्वी ही जीवनदायिनी है और पालनहार है। पृथ्वी की इसी ममतामयी छवि के कारण भवन निर्माण का कार्य इस पर होता है, क्योंकि भूमि के बिना भवन निर्माण नही हो सकता। कहने का तात्पर्य कि भवन निर्माण कार्य मे भूमि के महत्व को अनदेखा नही किया जा सकता तभी तो भारतीय प्राचीन ग्रन्थों मे पृथ्वी की महत्ता को 'माता' जैसे शब्दो से सम्बोधित किया गया है और भूमि पर किसी भी कार्य को प्रारम्भ करने से पूर्व पूजा का विधान रखा गया है।
2. जल
जल ही जीवन है इसमे मे कितनी सच्चाई है इसका अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि किसी सजीव या निर्जीव वस्तु का अस्तित्व 'जल' के बिना नही रह सकता और वह जल्द समाप्त हो जाती है। जीवन का कारण ही जलचक्र है। सागर, नदियों, नहरों, तालाबो इत्यादि का जल वाष्प बनकर आकाश मे चला जाता है और बादल के रूप मे आकर वर्षा बनकर जल के रूप में फिर से धरती पर आ जाता है। इसी से जीवन कायम है। यह तो विज्ञान भी मानता है कि जल मे एक अंश प्राणवायु (ऑक्सीजन) का भी होता है जोकि इन्सान के खून मे मिलकर नसो मे दौड़ता है और उसे जीवन देता है। जल तीन रूपों मे मिलता है जैसे ठोस (वर्षा) तरल व गैस (भाप एवं बादल)। आम तौर पर जल व अग्नि की जरूरत पड़ती है। यह पांचो महाभूत अलग अलग हो तो यह किसी काम के नही और अगर इन्हे एक रूप कर दिया जाए तो जीवन की एक अनुपम रचना बन सकती है।
इतिहाकारों का मानना है कि विश्व की महान सभ्यताएं जल के किनारे ही पली-बढ़ी व जल का ही ग्रास बन गई। अतः पृथ्वी के संचालन के लिए जल अत्यंत महत्वपूर्ण है। वास्तुशास्त्र के मुताबिक जल को मुख्य तत्व में रखा जाना चाहिए और निर्माण सामग्री मे इसके सन्तुलन को ध्यान मे रखना जरूरी है।
3. अग्नि
अग्नि व तेल यह ऊर्जा के स्त्रोत हे और बिना ऊर्जा के जीवन का कोई आधार नही है। ऊर्जा का प्रमुख स्त्रोत सूर्य है जिसके तेज से ही जीवन प्रकाशमान है। तेज को किसी भी मनुष्य के असाधारण गुण के रूप मे देखा जाता है। पर्यावरण मे व्याप्त वायुकण, धूल और बादल अपनी चुम्बकीय शक्ति के कारण एक दूसरे की ओर आकर्षित होते रहते है। इसी कारण इनके सिमटने और फैलने की क्रिया होती है जिसके बल से ऊर्जा पैदा होती है और यही ऊर्जा अग्नि है। अग्नि का मनुष्य की रोजमर्रा की जिन्दगी मे बहुत महत्व है जैसे भोजन इत्यादि पचाना व प्रकाश करना। हिन्दु संस्कृति के अनुसार धार्मिक कार्यक्रम मे भी अग्नि का बहुत महत्व है। जैसे यज्ञ, हवन, विवाह, संस्कार व अन्य कर्मकांड अग्नि के बिना अधूरे गिने जाते है। अग्नि को प्रचण्ड रूप मे भी देखा जा सकता है। जब यह देखते ही देखते बड़े-बड़े महलों व ऊंचे-ऊंचे भवनों को धूल मे मिला देती है। भारतीय शास्त्रो मे कहा गया है कि अग्नि मनुष्य के साथ जन्म से लेकर मरण तक रहती है और यह चिरन्तन सत्य है। अग्नि सत्य एवं अविनाशी है और मनुष्य जीवन के हरएक पहलू से जुड़ी है। इसे वास्तु मे भी बहुत महत्व दिया गया है।
4. वायु
चलते फिरते मनुष्य के जीवन मे वायु का बहुत महत्व है, जो कि श्वसन क्रिया से सम्बन्धित है। जब यह सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है तो मनुष्य का जीवन समाप्त हो जाता है। प्राणी ही नही पेड़ पौधे भी वायु के बिना क्षीण होकर समाप्त हो जाते है। मतलब यह कि वायु का संतुलन सृष्टि की रचना व स्थायित्व मे योगदान बहुत महत्वपूर्ण है। पृथ्वी पर वायु मण्डल का दायरा लगभग 400 कि.मी. है, जिसमें विभिन्न प्रकार की गैसों का मिश्रण है। मनुष्य जीवन के लिए दो गैसों आक्सीजन और हाईड्रोजन का बहुत महत्व है क्योंकि यही दोनो गैसें जल का कारक है और उससे मनुष्य का शरीर संचालित है। अगर इसमे कमी आ जाए तो मनुष्य को चमड़ी व खून के दबाव इत्यादि रोगों का सामना करना पड़ सकता है। मनुष्य की प्रत्येक क्रिया मे कहीं न कहीं पंच महाभूतों का सम्मिश्रण अवश्य पाया जाता है। यह मिश्रण किसी और ग्रह पर नही है तभी तो वहां जीवन संभव नही हो पाया है। वस्तुतः वायु मानव के लिए अन्य शक्तियों का अमूल्य उपहार है। वास्तु द्वारा वायु को इतनी पहल इसलिए दी गई है कि यह निर्माण कार्य को बहुत हद तक प्रभावित करती है।
5. आकाश
आकाश अनन्त असीम व अथाह है। यह ऊर्जा की तीव्रता, प्रकाश लौकिक किरणों, विद्युतीय व चुम्बकीय शक्तियों का प्रतीक है। यह अपने अन्दर एक आकाश गंगा नहीं बल्कि असीम आकाश गंगाए समाएं हुए हैं, जिनमें हमारे सूर्य जैसे सैकड़ों सूर्य चमक रहे है। सभी ग्रह-उपग्रह अपनी स्थिति एवं समयानुसार इसमे परिक्रमा कर रहे है। हमारे जीवन मे समृद्धि व आनन्द लाने मे आकाश का महत्वपूर्ण स्थान है।
यदि इन्सान अपनी जिन्दगी मे सुख, समृद्धि व आनन्द पाना चाहता है तो उसे पंच महाभूतों को यथोचित सम्मान देना चाहिए ताकि वह अपने जीवन मे अरोग्यता, शान्ति, समृद्धि व उन्नति प्राप्त कर सके।

पंच भूतों का गृह में स्थानः- जैसा कि आपको पहले बताया है कि सारा ब्रह्माण्ड पंच तत्वों से बना हुआ है और वैसे ही इन पंच तत्वों का भवन में कहां पर निवास है यह नीचे बताया गया है।
1.जलः- जल का स्थान उत्तर पूर्व दिशा मे बताया गया है। जल का भूमिगत भण्डारण, कुआं इत्यादि पूर्व उत्तर दिशा में होना चाहिए ताकि सूर्य की सुबह की किरणे इस पर पड़े और द्घातक कीटाणु नष्ट हो जाएं। इस तरफ जल का भण्डार होने से गृह स्वामी को खुशी व समृद्धि प्राप्त होती है।
2.अग्निः- अग्नि का स्थान दक्षिण पूर्व मे है। इसलिए रसोई का स्थान इस दिशा में होना चाहिए। अग्नि को जलाते समय मनुष्य का मुख पूर्व दिशा में होना चाहिए। इससे द्घर में खुशी व समद्धि रहती है और मनुष्य का मन शान्त रहता है।
3.भूमिः- भवन के दक्षिण पश्चिम भाग को सख्त माना गया है इसलिए इस दिशा को भूमि की संज्ञा दी गई है। कहते हैं कि यह दिशा जितनी ऊंची होगी गृह स्वामी का उतना ही अधिक मान सम्मान होगा और वह समाज मे बहुत ऊंचा दर्जा प्राप्त करता है।
4.वायुः-वायु का स्थान उत्तर-पश्चिम में माना गया है। इसलिए भवन के दरवाजे, खिडकियां इत्यादि इसी दिशा में बनवाने की सलाह दी जाती है। ताकि द्घर में पर्याप्त वायु प्रवेश करें और द्घर में रहने वालों को पूर्ण रूप से वायु मिले। अगर इस दिशा में वायु का प्रवाह बिना रूकावट मिले तो ऐसे भवन के स्वामी को हमेशा खुशी मिलेगी और व्यापार मे तरक्की एवं अच्छे मित्र मिलेंगें जो सुख दुख के साथी होगें।
5.आकाशः- आकाश का सम्बन्ध भवन के बीच के स्थान को दिया जाता है। भवन निर्माण करते समय बीच वाले स्थान को खाली छोड़ देना चाहिए। इसे बहा स्थान भी कहा जाता है। यह स्थान आकाश से सीधा दिखाई देना चाहिए। इसके बीच मे बीम इत्यादि या रूकावट नहीं होनी चाहिए। छोटे भवनों वाले इस तरह का स्थान नही बना सकते परन्तु उन्हें कोशिश करनी चाहिए कि भवन के बीच का स्थान खाली रहे चाहे तो समतल ही रहनें दे। कोई भी भारी सामान बना रहता है और धर्म कर्म के अभिरूचि बनी रहती है।    >>Next>>

   
 
 

 

 

     
     
 
 
 

About us    |    Channels    |    Product    |    Advertise with us    |    Privecy & Policy    |    Services